
भारत सरकार ने शनिवार को उन तमाम अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिका की ‘अनुमति’ की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने एक कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता है और उसे किसी भी देश से ‘छूट’ (Waiver) लेने की ज़रूरत नहीं है।
“हमारा निर्णय, हमारी संप्रभुता”
हाल ही में अमेरिका द्वारा रूसी तेल आयात के लिए दी गई 30 दिनों की ‘अस्थायी छूट’ पर प्रतिक्रिया देते हुए सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति किसी बाहरी शक्ति के दबाव में नहीं चलती। सरकार ने कहा, “भारत रूसी तेल खरीदने के लिए कभी किसी देश की अनुमति पर निर्भर नहीं रहा है। फरवरी 2026 में भी रूसी तेल का आयात निर्बाध रहा और रूस आज भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।”
ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार
मिडल-ईस्ट में जारी ईरान-इज़राइल युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर तनाव चरम पर है। इस भौगोलिक चुनौती का सामना करने के लिए भारत ने अपनी रणनीति पहले ही तैयार कर ली है:
- विविधीकरण (Diversification): भारत ने अपने कच्चे तेल के स्रोतों को 27 से बढ़ाकर 40 देशों तक पहुँचा दिया है।
- रिफाइनरी क्षमता: भारतीय रिफाइनरियाँ तकनीकी रूप से इतनी उन्नत हैं कि वे दुनिया के विभिन्न ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकती हैं, जिससे आपूर्ति में किसी भी वैश्विक संकट का असर न्यूनतम हो जाता है।
- प्रतिस्पर्धी दरें: सरकार का रुख साफ है कि भारत वहीं से तेल खरीदेगा जहाँ उसे सबसे बेहतर और किफायती कीमतें मिलेंगी।
विपक्ष का हमला और सरकार का पलटवार
इस मुद्दे पर देश की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि अमेरिका द्वारा ‘छूट’ की घोषणा करना भारतीय कूटनीति की कमज़ोरी को दर्शाता है। विपक्ष का कहना है कि यह स्थिति भारत की ‘स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी’ पर सवाल खड़ा करती है।
हालाँकि, सरकार ने तथ्यों के साथ जवाब देते हुए याद दिलाया कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के समय से ही पश्चिमी देशों (अमेरिका और यूरोपीय संघ) ने भारी दबाव बनाया था, लेकिन भारत ने अपने नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए रूसी तेल खरीदना जारी रखा।
निष्कर्ष
7 मार्च 2026 को जारी इस आधिकारिक बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत एक ‘बैलेंसिंग पावर’ के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। अमेरिका की 30 दिन की छूट भले ही तकनीकी या कूटनीतिक पैंतरा हो, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को ‘नेशन फर्स्ट’ (राष्ट्र प्रथम) के सिद्धांत पर अडिग रखा है।
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