
राजनीति में खामोशी कभी-कभी ‘रणनीति’ होती है, लेकिन जब युद्ध आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो, तो यही खामोशी ‘विवशता’ नजर आने लगती है। 4 मार्च, 2026 को हिंद महासागर के शांत पानी में जो हुआ, उसने न केवल अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों को तार-तार किया, बल्कि भारत की उस छवि पर भी गहरा आघात किया है जिसे हम ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ (Net Security Provider) कहते आए हैं।
विशाखापत्तनम से विदाई, श्रीलंका के पास ‘जल-समाधि’
विडंबना देखिए, ईरानी युद्धपोत IRIS Dena अभी कुछ दिन पहले तक भारतीय नौसेना के भव्य आयोजन MILAN-2026 और ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू’ का सम्मानित अतिथि था। विशाखापत्तनम की लहरों पर तिरंगे और ईरानी ध्वज ने एक साथ मार्च किया था। लेकिन अपनी मेहमाननवाजी खत्म कर जैसे ही यह जहाज घर की ओर मुड़ा, श्रीलंकाई तट से महज 40 नॉटिकल मील दूर एक अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो से इसे डुबो दिया।
अमेरिकी रक्षा सचिव पेट हेगसेथ ने इसे “शांत मृत्यु” (Quiet Death) करार दिया। लेकिन 80 से अधिक ईरानी नाविकों की इस मौत ने भारत के ‘बैकयार्ड’ (Backyard) में जो शोर मचाया है, उस पर दिल्ली की चुप्पी कान फोड़ने वाली है।
विपक्ष का तीखा सवाल: “क्या हम डर गए हैं?”
इस घटना ने देश के भीतर एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए ‘एक्स’ (X) पर लिखा:
“हमारे मेहमान को हमारे ही पड़ोस में मार दिया गया और प्रधानमंत्री चुप हैं। संघर्ष हमारे घर तक पहुंच गया है, लेकिन नेतृत्व गायब है। यह रणनीतिक स्वायत्तता का आत्मसमर्पण है।”
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे ‘राष्ट्रीय हितों का परित्याग’ बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 1,100 भारतीय नाविक और 38 जहाज होर्मुज की खाड़ी में फंसे हैं, तब सरकार एक ‘अतिथि’ जहाज पर हुए हमले पर संवेदना का एक शब्द तक क्यों नहीं बोल पा रही है? क्या अमेरिकी दबाव इतना है कि हम एक औपचारिक ‘निंदा’ करने की हिम्मत भी खो चुके हैं?
विशेषज्ञों की राय: ‘रणनीतिक शर्मिंदगी’
सिर्फ राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि रक्षा विशेषज्ञ भी इस चुप्पी से हैरान हैं। पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश और विश्लेषक सी. उदय भास्कर ने इसे भारत के लिए एक ‘रणनीतिक शर्मिंदगी’ (Strategic Embarrassment) करार दिया है। उनका तर्क है कि यदि भारत हिंद महासागर का ‘रक्षक’ है, तो उसकी नाक के नीचे एक महाशक्ति द्वारा दूसरी क्षेत्रीय शक्ति के जहाज को डुबो देना हमारी क्षेत्रीय प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा करता है।
- ईरान का पक्ष: ईरानी विदेश मंत्री अरागची ने इसे भारत के ‘राजनयिक संरक्षण’ पर हमला बताया है।
- भारत का कदम: अब तक केवल विदेश सचिव का ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करना ही भारत की एकमात्र ‘प्रतिक्रिया’ रही है।
श्रीलंका की दिलेरी: जब ‘छोटे पड़ोसी’ ने दिखाया बड़ा दिल
जहाँ भारत कूटनीतिक नफे-नुकसान का हिसाब लगा रहा था, वहीं हमारे छोटे पड़ोसी श्रीलंका ने वह कर दिखाया जो एक ‘क्षेत्रीय शक्ति’ को करना चाहिए था। हमले के तुरंत बाद, श्रीलंका ने अंतरराष्ट्रीय दबाव और महाशक्तियों के टकराव की परवाह किए बिना अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
- श्रीलंकाई नौसेना ने डूबते जहाज से 32 ईरानी नाविकों को सुरक्षित बाहर निकाला।
- राष्ट्रपति दिसानायके ने स्पष्ट कहा कि यह राजनीति का नहीं, मानवीय धर्म निभाने का समय है।
- श्रीलंका ने न केवल घायलों का इलाज कराया, बल्कि शहीद नाविकों के शवों को भी सम्मानपूर्वक बरामद किया।
निष्कर्ष: ‘विश्वगुरु’ या मूकदर्शक?
यह घटनाक्रम भारत के लिए एक कड़वा सबक है। अगर हम अपने समुद्री क्षेत्र में अपने ही मेहमानों की सुरक्षा नहीं कर सकते, या कम से कम उनके लिए आवाज नहीं उठा सकते, तो ‘विश्वगुरु’ जैसे शब्द बेमानी लगने लगते हैं। आज श्रीलंका ने हमें आईना दिखाया है कि कूटनीति केवल कागजों और दौरों से नहीं, बल्कि सही समय पर सही स्टैंड लेने से चलती है।
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