इंटरनेट का अधिकार भी अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत आता है – J&K में पाबंदियों पर SC का फैसला

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Image Credit: DNA India

5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर में वर्षों से चलो आ रही धारा 370 को खत्म कर उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बांट दिया गया और तभी से वहाँ इंटरनेट समेत अन्य सुविधाएँ बाधित है. J&K इंटरनेट बैन और लॉक डाउन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएँ दाख़िल की गयी थी जिसपर आज (शुक्रवार) फैसला सुनाया गया. जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की संयुक्त बेंच इस मामले में फैसला सुनाया.

जस्टिस रमना ने फैसला पढ़ते कहा कि कश्मीर ने बहुत हिंसा देखी है. इंटरनेट फ्रीडम ऑफ स्पीच के तहत आता है. यह फ्रीडम ऑफ स्पीच का जरिया भी है. इंटरनेट आर्टिकल-19 के तहत आता है. नागरिकों के अधिकार और सुरक्षा के संतुलन की कोशिशें जारी हैं. इंटरनेट बंद करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है. जस्टिस रमना ने सरकार को जम्मू-कश्मीर में सभी पाबंदियों पर एक हफ्ते के भीतर समीक्षा करने का आदेश दिया है.

अदालत ने धारा 144 लगाने पर टिप्पणी करते हुए कहा की धारा 144 न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है. कोर्ट ने फैसला सुनाया की सरकार 144 लगाने को लेकर भी जानकारी सार्वजनिक करे, समीक्षा के बाद जानकारी को पब्लिक डोमेन में डालें ताकि लोग कोर्ट जा सकें. सरकार इंटरनेट व दूसरी पाबंदियों से छूट नहीं पा सकती.

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सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सभी इंटरनेट सेवाओं के निलंबन के निर्देश और सभी सरकारी और स्थानीय निकाय वेबसाइटों की बहाली का आदेश दिया जहां इंटरनेट का दुरुपयोग न्यूनतम है. कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता. जहां जरूरत हो वहां फौरन इंटरनेट बहाल हो.

सुप्रीम कोर्ट का ये रूख जम्मू-कश्मीर और वहाँ से जुड़े लोगों के लिए थोड़ी राहत भरी ख़बर हो सकती है; जबकि, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के लिए बहुत अच्छी ख़बर तो नहीं है क्योंकि देश में जिस तरह से CAA और NRC के खिलाफ आंदोलन चल रहा उसको देखते हुए सरकार को जम्मू-कश्मीर में नागरिकों की शुरक्षा सुनिश्चित करना और शांति बहाल रखना आसान नहीं होगा.

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