1962 का भारत-चीन युद्ध – जब सरकार के गलत विदेश और रक्षा निति की कीमत सेना ने जान देकर चुकाई

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1962 का भारत-चीन युद्ध - जब सरकार गलत विदेश और रक्षा निति की कीमत सेना ने जान देकर चुकाई-1962-india-china-war-story-soldiers-sacrificed-their-life-due-to-bad-foreign-policy-IndiNews
Image Source: Getty Images

जैसा कि सर्वविदित है, दो देशों के बीच की जो भी विवाद युद्ध मे परिणत हुए उनका कोई न कोई ऐतिहासिक कारण रहा है, भारत चीन युद्ध भी इसका एक उदाहरण है.

विदेश मंत्रालय की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह विवाद को हल करें या उसके लिए माहौल तैयार करे. लेकिन जब यह लगने लगे कि राजनायिक प्रयाश विफल हो रहा है तो देश को युद्ध के लिए तैयार होना चाहिए. भारत और चीन के 1962 के युद्ध की जमीन 1950 में ही लिखी जा चुकी थी, जब चीन के आर्मी ने तिब्बत पर चढ़ाई कर दी जो उस समय तक आज़ाद देश था और दलाई लामा उसके शासक हुआ करते थे.

क्या है तिब्बत का मसला?

अठारहवीं सत्ताब्दी तक तिब्बत एक आज़ाद देश था. 1720 में चीन के आर्मी ने तिब्बत में प्रवेश किया. 1792 में चीन ने तिब्बत को अधिकारिक रूप से देश का अपना हिस्सा बता दिया. उन्नीसवी सताब्दी के आखिर के समय में जब चीन कमजोर पड़ने लगा तो तिब्बत ने अपने आप को आजाद घोषित कर दिया और चीन को बिना बताये दलाई लामा को अपना शासक चुन लिया.

साल 1910 में चीन ने फिर से तिब्बत पर आक्रमण किया और दलाई लामा को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया. इसी बिच चीन में क्रांति हुई और सत्ता परिवर्तन हो गया. 1912 दलाई लामा वापस लौटे और तिब्बत की कमान संभाला. 1914 के शिमला त्रिपक्षीय (चीन, तिब्बत और ब्रिटिश या तब के भारत सरकार) बातचीत में चीन ने तिब्बत के स्वायता को मान्यता दे दी. इसी 1914 के Simla Convention में McMahon Line सामने आया जो भारत, चीन और तिब्बत के सिमा का निर्धारण करता है.

चीन इसे ब्रिटिश के भारत मे शासन तक तो मानता रहा क्योंकि वो ब्रिटिश साम्राज्य के समक्ष कमजोर था. लेकिन भारत के आजाद होते ही चीन तिब्बत को अपना हिस्सा बताने लगा. अगस्त 1950 को चीनी सरकार ने आर्मी एक्शन के द्वारा तिब्बत को देश में मिलाने का फैसला कर लिया और साल के अंत तक दलाई लामा को मजबूर कर चीन का हिस्सा बनने को मना लिया. 11 मार्च 1959 को चीन ने दलाई लामा को हटा दिया और तिब्बत पर पूर्णतया कब्ज़ा कर लिया.

भारत की प्रतिक्रिया:

चीन के McMahon Line को नहीं मानना भारत के लिए खतरे की घंटी थी और चीन का तिब्बत को अपने में मिला लेना किसी बड़ी चेतावनी से कम नहीं था परन्तु इतने सवेदनशील मुद्दे पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया बिलकुल ही गैर जिम्मेदारी वाला था. पहले तो भारत ने दलाई लामा के मदद की गुहार को ठुकरा दिया और फिर यह कहने से भी नही चुके की तिब्बत सांस्कृतिक दृष्टि से चीन के ज्यादा करीब है. भारत विदेश निति नेहरु जी के विश्व प्रसिद्द नेता के छवि के भरोसे चलती थी.

नेहरु उस समय गुट निरपेक्ष देशों का नेतृत्व कर रहे थे और उन्हें लगता था डिप्लोमेसी से सभी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है. नेहरु जी हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे के सहारे चीन से सीमा विवाद हल होने ही आस लगाये बैठे थे. इस दौरान भारत में कुछ राजनेताओं और सैनिक अधिकारी ने सरकार से चीन के मंशा पर शक जतायी और युद्ध की तैयारी करने की सलाह दी, जिनमें प्रमुख थे जय प्रकाश नारयण, सरदार बल्लव भाई पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी. सरदार साहब ने इसका उल्लेख नेहरु जी को लिखे एक पत्र में किया था, जिसे आप भी पढ़ सकते हैं. परन्तु तत्कालिक नेहरु सरकार ने किसी की भी बात को गंभीरता से नहीं लिया.

Sources: Himalayan Blunder

चीन का आक्रमण:

युद्ध की शुरुआत 20 अक्टूबर, 1962 को हुई. चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी ने लद्दाख पर और नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) में मैकमोहन लाइन के पार हमला कर दिया. युद्ध के शुरू होने तक भारत को पूरा भरोसा था कि युद्ध शुरू नहीं होगा, इस वजह से भारत की ओर से तैयारी नहीं की गई. यही सोचकर युद्ध क्षेत्र में भारत ने सैनिकों की सिर्फ दो टुकड़ियों को तैनात किया जबकि चीन की वहां तीन रेजिमेंट्स तैनात थीं. चीनी सैनिकों ने भारत के टेलिफोन लाइन को भी काट दिए थे। इससे भारतीय सैनिकों के लिए अपने मुख्यालय से संपर्क करना मुश्किल हो गया था.

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पहले दिन चीन की पैदल सेना ने पीछे से भी हमला किया. लगातार हो रहे नुकसान की वजह से भारतीय सैनिकों को भूटान से निकलना पड़ा. 22 अक्टूबर को चीनी सैनिकों ने एक झाड़ी में आग लगा दी जिससे भारतीय सैनिकों के बीच काफी कन्फ्यूजन पैदा हो गया. इसी बीच करीब 400 चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के ठिकाने पर हमला कर दिया.

चीन के शुरुआती हमलों का तो भारत की ओर से मोर्टार दागकर सामना किया गया. जब भारतीय सैनिकों को पता चला गया कि चीनी सैनिक एक दर्रे में जमा हुए हैं तो इसने मोर्टार और मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी. इस हमले में चीन के करीब 200 सैनिक मारे गए. भारतीय सेना पूरी तरह तैयार नहीं थी, इस वजह से चीन की सेना तेजी से भारतीय इलाकों में घुसती गई. 24 अक्टूबर तक चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में 15 किलोमीटर अंदर तक आ गए।

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चीन का एकतरफा संघर्ष विराम:

चीन ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी. लेकिन चीन ने अकसाई चीन पर कब्जा कर लिया और पूर्वोत्तर के इलाके से निकल गया।

इस पुरे प्रकरण पर युद्ध में शामिल मेजर जॉन डालवी ने एक किताब लिखी जिसमें उन्होंने तत्कालिक भारत सरकार के विफल सैन्य और विदेश निति का उल्लेख किया था. किताब का नाम है “Himalayan Blunder

भारत-चीन युद्ध के 50 साल बाद ब्रिगेडियर बहल ने बीबीसी से बातचीत में युद्ध और उसके बाद के अनुभव को साझा किया था. ब्रिगेडियर बहल और बीबीसी के बातचीत को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

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