
अयोध्या के राम मंदिर में दान पेटियों से करोड़ों रुपये के कथित गबन के मामले में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई हो चुकी है. दो कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया है. एक के घर छापा पड़ा और गोबर के ढेर में छिपाया गया नकद बरामद हुआ. ₹18,000 से ₹20,000 मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के नाम पर ₹1.5 करोड़ और ₹40 लाख की संपत्तियाँ सामने आई हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने SIT गठित कर दी है. Allahabad High Court में PIL दायर हो चुकी है.
लेकिन एक सवाल है जिसका जवाब अभी तक किसी ने नहीं दिया.
FIR कहाँ है?
क्या हुआ अब तक. घटनाक्रम
7 जून 2026 को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि राम मंदिर की दान पेटियों से करोड़ों रुपये गायब हुए हैं. इसके बाद मामला तेज़ी से बढ़ा.
ट्रस्ट ने दान गिनने के काम में लगे दो कर्मचारियों को हिरासत में लिया और उनसे पूछताछ शुरू की. सूत्रों के अनुसार इन दोनों की संपत्तियाँ उनकी तनख्वाह के हिसाब से कहीं अधिक पाई गईं. एक कर्मचारी ने कथित तौर पर ₹1.5 करोड़ की जमीन खरीदी, दूसरे के नाम पर ₹40 लाख की property सामने आई.
इसके बाद 13 जून को पुलिस ने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के साथ रुदौली क्षेत्र के मीनापुर ठाकुरान गाँव में 27 वर्षीय पूर्व कर्मचारी लवकुश मिश्रा के घर पर छापा मारा. वहाँ से ₹10 लाख से ₹12 लाख नकद बरामद हुए. रिपोर्टों के अनुसार यह नकद गोबर के ढेर में छिपाया गया था.
उसी दिन शाम को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीन सदस्यीय SIT गठित कर दी. SIT में Vijay Vishwas Pant, IAS, Divisional Commissioner Lucknow. Kiran S, IPS, Inspector General of Police. और Neel Ratan, Special Secretary Finance शामिल हैं.
FIR क्यों नहीं. यह सबसे बड़ा सवाल है
Cash बरामद हुआ. संपत्तियाँ सामने आईं. दो लोग हिरासत में हैं. SIT बन गई. लेकिन 14 जून 2026 तक किसी के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं हुई है.
यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं है. यह एक गंभीर कानूनी सवाल है.
भारतीय कानून के तहत किसी भी cognizable offence में FIR दर्ज होना अनिवार्य है. बिना FIR के पुलिस न तो कानूनी रूप से गिरफ्तारी कर सकती है, न 24 घंटे से अधिक किसी को हिरासत में रख सकती है, न ही SIT को कोई formal legal authority मिलती है. अभी जो दो कर्मचारी “हिरासत में” हैं, वे किस legal provision के तहत रोके गए हैं. यह स्पष्ट नहीं है.
Allahabad High Court में PIL दायर करने वाले अधिवक्ता मोहित अशोक ने भी इसी बिंदु पर ध्यान दिलाया है और CBI जाँच तथा CAG forensic audit की माँग की है.
चंपत राय खुद छापे में क्यों थे?
यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
जब पुलिस लवकुश मिश्रा के घर गई, तो उनके साथ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय भी थे. लवकुश के पिता बच्चू लाल ने मीडिया को बताया कि “ट्रस्ट के तीन-चार प्रतिनिधि, जिनमें चंपत राय भी थे, घर का ताला तोड़कर अंदर घुसे और नकदी ले गए.” उनका यह भी कहना है कि उनके बेटे का फैज़ाबाद में जो निर्माण कार्य बताया जा रहा है, वह उनका अपना है जो 10 से 12 बीघा कृषि भूमि गिरवी रखकर किया जा रहा है.
यदि यह एक सरकारी पुलिस कार्रवाई थी, तो ट्रस्ट के महासचिव उसमें क्यों थे? यदि यह ट्रस्ट की internal कार्रवाई थी, तो बिना court order के ताला तोड़कर नकदी ले जाना किस कानून के तहत है? और जो नकदी ले जाई गई, उसकी official receipt कहाँ है?
इन सवालों का जवाब अभी तक नहीं आया है.
₹18,000 की तनख्वाह, ₹1.5 करोड़ की जमीन.
भारतीय दंड संहिता और Prevention of Corruption Act के तहत जब किसी व्यक्ति की संपत्ति उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक पाई जाती है, तो यह अपने आप में एक cognizable offence है. ऐसे मामलों में FIR अनिवार्य है.
₹18,000 से ₹20,000 मासिक वेतन पर काम करने वाले दो कर्मचारियों के नाम पर ₹1.5 करोड़ और ₹40 लाख की संपत्तियाँ होना, और साथ में घर से ₹10-12 लाख नकद मिलना. यह आय से अधिक संपत्ति का स्पष्ट मामला बनता है. फिर भी FIR नहीं.
SIT की सीमाएँ. बिना FIR के क्या होगा?
SIT का गठन तो हो गया, लेकिन उसके सामने कई कानूनी बाधाएँ हैं.
बिना FIR के SIT के पास कोई formal investigative power नहीं होती. वह केवल “जाँच” कर सकती है, लेकिन गिरफ्तारी, charge sheet, या court में prosecution के लिए FIR अनिवार्य है. इसके अलावा SIT का गठन UP सरकार ने किया है. वही सरकार जो इस ट्रस्ट की संरक्षक रही है. Congress के UP अध्यक्ष अजय राय ने इसे “आँखों में धूल झोंकना” बताया है और High Court judge की अध्यक्षता में जाँच की माँग की है.
मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा, जो PMO के प्रतिनिधि माने जाते हैं, पाँच दिनों में दूसरी बार अयोध्या आए. लेकिन उन्होंने दान और वित्तीय अनियमितताओं पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
ट्रस्ट का बचाव. “miscalculation” शब्द का चुनाव
ट्रस्ट के camp office in-charge प्रकाश गुप्ता ने मीडिया से कहा कि दान में “miscalculation” की संभावना से वे इनकार नहीं करते, लेकिन मंदिर प्रशासन को clean chit दी. यह बयान ध्यान देने योग्य है. “Miscalculation” एक बेहद हल्का शब्द है जब सामने ₹10-12 लाख नकद, करोड़ों की संपत्तियाँ और दो कर्मचारी हिरासत में हों.
चंपत राय ने कहा है कि ट्रस्ट के अंदर internal audit चल रही है और SIT जाँच का समर्थन किया है. लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि FIR क्यों नहीं दर्ज की गई.
Allahabad High Court में PIL. अब न्यायालय की निगाह
Allahabad High Court की Lucknow bench में अधिवक्ता मोहित अशोक ने PIL दायर की है जिसमें मांग की गई है. CBI की निगरानी में स्वतंत्र और समयबद्ध जाँच हो. CAG द्वारा ट्रस्ट के accounts का comprehensive forensic audit हो. दान में प्राप्त नकद, सोने और चाँदी, सभी की जाँच हो.
PIL में उस खुलासे का भी उल्लेख है जिसमें जब महिपाल सिंह ने voucher-signing process और नकद गिनती की पद्धति पर आपत्ति जताई, तो उन्हें Gopal Rao ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका काम केवल “बैठना” है, सवाल पूछना नहीं.
यह PIL अब इस मामले को एक नया कानूनी आयाम दे सकती है.
पृष्ठभूमि. यह पहली बार नहीं है
यह पहली बार नहीं है जब ट्रस्ट के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल उठे हैं. 2021 में ज़मीन खरीद के मामले में दस्तावेज़ों में यह दर्ज है कि अयोध्या के बाग बिजैसी में एक भूखंड ₹2 करोड़ में पंजीकृत हुआ और 10 मिनट बाद वही ज़मीन ट्रस्ट ने ₹18.5 करोड़ में खरीद ली. उस समय भी RSS नेतृत्व ने चंपत राय से स्पष्टीकरण माँगा था. उस समय भी कोई FIR नहीं हुई थी.
पाँच साल बाद, उसी ट्रस्ट में, उन्हीं हालात में, वही चुप्पी और वही “FIR नहीं” का पैटर्न दोहराया जा रहा है.
आगे क्या होगा. तीन संभावनाएँ
पहली संभावना यह है कि SIT जाँच करे, कर्मचारियों पर दोष मढ़ा जाए, FIR दर्ज हो, और मामला “निचले स्तर की चोरी” तक सीमित रहे. ट्रस्ट के उच्च प्रबंधन और वित्तीय व्यवस्था पर कोई सवाल न उठे.
दूसरी संभावना यह है कि Allahabad High Court PIL पर सुनवाई करे और CBI जाँच या CAG audit का आदेश दे. यह एकमात्र रास्ता है जो इस मामले को trust के भीतरी दायरे से बाहर ले जा सकता है.
तीसरी संभावना यह है कि SIT की रिपोर्ट आए, मामला “सुलझा हुआ” घोषित हो जाए और असली सवाल. ₹7 करोड़ कहाँ गए, system कैसे काम करता था, ऊपर तक जिम्मेदारी किसकी है. वे अनुत्तरित रह जाएँ.
जरुरी सवाल!
कैश मिला. संपत्तियाँ मिलीं. दो लोग हिरासत में हैं. SIT बन गई. PIL दायर हो गई.
लेकिन FIR नहीं है.
सरकार और राम मंदिर से जुड़े ट्रस्ट के कर्ताधर्ता या डबल इंजन की सरकार क्या किसी को बचाना चाह रही है? या यह इसलिए किया जा रहा है क्योंकि राम मंदिर के नाम पर जो प्रचार सरकार ने किया है, जिसे वह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानती है, उस पर धब्बा न लगे. क्या जाँच के बाद भी सरकार पारदर्शिता रख पाएगी? शायद नहीं. याद रहे, PM CARES Fund से जुड़ी जानकारी में पारदर्शिता आज तक नहीं आई है.









