भगवान के घर में सब हिसाब होता है, लेकिन ट्रस्ट-चढ़ावे में घपले के आरोप पर जवाब कौन देगा?

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भगवान के घर में भी हिसाब होता है, लेकिन ट्रस्ट में घपले के आरोप पर जवाब कौन देगा?

किसी को दोषी ठहराना या दोषमुक्त करना न्यायालय का काम है. न्यायालय वह काम करे. लेकिन जनता को, और खासकर उन करोड़ों रामभक्तों को जिनकी अटूट श्रद्धा भगवान राम में है, सच जानने और न्याय पाने का पूरा अधिकार है. और यह ज़िम्मेदारी केवल ट्रस्ट की नहीं, सरकार की है. क्योंकि वर्तमान “डबल इंजन” सरकार ने हर मौके पर देश के हर कोने में राम मंदिर और राम नाम को भुनाया है और इसे अपनी सबसे प्रमुख उपलब्धियों में से एक मानती है. जब श्रेय लेना हो तो राम याद आते हैं. तो जवाबदेही के वक्त राम के भक्तों को जवाब देने की ज़िम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता.

और राम मंदिर ट्रस्ट के इर्द-गिर्द जो सवाल उठे हैं, वे न विपक्ष की राजनीति से उपजे हैं, न किसी एक मीडिया रिपोर्ट से. वे उन लोगों के मुँह से निकले हैं जो इस मंदिर आंदोलन के अपने हैं. और यही उन्हें नज़रअंदाज़ करना असंभव बना देता है.

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के खिलाफ जो आरोप हैं, वे अभी आरोप ही हैं. लेकिन आरोप लगाने वालों की साख, उनकी स्थिति और उनके बयानों की परस्पर संगति. यह सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जिसे “राजनीतिक साजिश” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. इस तस्वीर की जाँच होनी चाहिए. और यदि नहीं होती, तो वह चुप्पी खुद एक बयान है.

₹5,400 करोड़ आए, ₹2,150 करोड़ खर्च हुए. हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं?

ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने स्वयं मार्च 2025 में स्वीकार किया कि ट्रस्ट को ₹3,500 करोड़ से अधिक दान प्राप्त हुआ, जिसमें से ₹2,150 करोड़ निर्माण पर खर्च हुए. अन्य रिपोर्टों के अनुसार 2022 तक संग्रहीत दान ₹5,400 करोड़ से भी ऊपर जा चुका था.

ट्रस्ट का यह भी दावा रहा है कि CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) नियमित ऑडिट करता है. यदि यह सच है, तो प्रश्न केवल इतना है. वे रिपोर्टें सार्वजनिक क्यों नहीं हैं? जो ट्रस्ट करोड़ों आम नागरिकों के दान से चलता है, उसका वित्तीय विवरण उन्हीं नागरिकों से छिपाने का कोई नैतिक औचित्य नहीं है. पारदर्शिता से बचना बेगुनाही की निशानी नहीं होता.

अंदर के आदमी ने जब आवाज़ उठाई, तो उसे बाहर क्यों किया गया?

इस पूरे विवाद को सबसे अधिक विश्वसनीयता देता है ट्रस्ट के पूर्व अकाउंट्स इन-चार्ज महिपाल सिंह का बयान. राजस्थान के पूर्व बैंक अधिकारी महिपाल सिंह जनवरी 2021 से अप्रैल 2022 तक ट्रस्ट में मुख्य लेखा अधिकारी रहे. उनके आरोप, जो अभी तक आरोप ही हैं, अत्यंत विशिष्ट और गंभीर हैं.

उनका कहना है कि उन्होंने संग्रह प्रणाली के भीतर ₹5 लाख की हेराफेरी पकड़ी और उच्च प्रबंधन को लिखित में सूचित किया. उनका आरोप है कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि शिकायत करने के कारण उन्हें ही पद से हटा दिया गया. वे यह भी आरोप लगाते हैं कि नोटों के बंडल गिने तो पूरे जाते थे, लेकिन लेजर में उनका केवल एक अंश दर्ज होता था. सोने-चाँदी के चढ़ावे बिना किसी आधिकारिक प्रविष्टि के सीधे बड़े कंटेनरों में डाल दिए जाते थे. और यह भी कि गिनती वाले कमरों की CCTV फुटेज के साथ छेड़छाड़ हुई अथवा उन्हें मिटाया गया.

इन आरोपों की सत्यता की जाँच होनी चाहिए. और ट्रस्ट ने अब तक इनका कोई तथ्यात्मक खंडन नहीं किया है. किसी व्हिसलब्लोअर को दंडित करना और फिर उसके आरोपों का जवाब न देना. यह संस्थागत व्यवहार स्वयं एक सवाल है.

SBI का नाम, लेकिन काम प्राइवेट एजेंसी का. यह व्यवस्था किसने बनाई?

चंपत राय का सबसे बड़ा बचाव यही रहा कि हुंडी की गिनती SBI के कर्मचारियों की उपस्थिति में होती है. लेकिन यह तथ्य सामने आया कि SBI ने यह नकद गिनती एक निजी थर्ड-पार्टी एजेंसी को आउटसोर्स कर रखी थी. बैंक के स्थायी कर्मचारी स्वयं नोट नहीं गिन रहे थे.

यदि यह सच है, तो “SBI की निगरानी” का दावा किस हद तक अर्थपूर्ण रह जाता है. यह एक स्वाभाविक प्रश्न है. उल्लेखनीय यह भी है कि इस पूरे मामले की भनक सबसे पहले SBI को ही लगी. बैंक खातों में दैनिक दान जमा होने के रुझान में असामान्य गिरावट देखकर. यानी जिस प्रणाली को निगरानी का जिम्मा दिया गया था, उसी के संकेत पर यह विवाद खुला. यह तथ्य आंतरिक ऑडिट की पर्याप्तता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है.

ज़मीन के सौदे. दस्तावेज़ों में दर्ज सवाल, जवाब आज तक नहीं

यह पहला मौका नहीं है जब ट्रस्ट के वित्तीय निर्णयों पर उंगली उठी है.

मार्च 2021 में दस्तावेज़ों के अनुसार, जो AAP, SP और कांग्रेस सभी ने सार्वजनिक किए, अयोध्या के बाग बिजैसी क्षेत्र में एक भूखंड ₹2 करोड़ में पंजीकृत हुआ. उसी दिन, महज 10 मिनट बाद, राम मंदिर ट्रस्ट ने वही ज़मीन ₹18.5 करोड़ में खरीद ली. और खरीदार के रूप में हस्ताक्षर थे चंपत राय के. एक अन्य भूखंड ₹20 लाख में खरीदा गया और 79 दिन के भीतर ट्रस्ट को ₹2.5 करोड़ में बेचा गया. यानी मूल्य में 1,250% की वृद्धि. एक और मामले में ₹2 करोड़ की जमीन 19 मिनट में ₹18 करोड़ में ट्रस्ट को बेची गई.

इन सौदों के गवाह कौन थे? एक RSS पदाधिकारी और अयोध्या के मेयर.

चंपत राय ने इन आरोपों को “राजनीति से प्रेरित” बताकर खारिज किया और कहा कि जमीन बाज़ार भाव से कम में खरीदी गई. लेकिन 2021 में RSS नेतृत्व स्वयं इतना चिंतित था कि उसने चंपत राय को चित्रकूट में स्पष्टीकरण देने बुलाया. उस समय RSS की दुविधा यह थी कि UP चुनाव से पहले राय को हटाना आरोपों को स्वीकार करने जैसा दिखेगा. यानी राजनीतिक हित जवाबदेही के आड़े आया. और वही पैटर्न 2025 में भी दोहराया जा रहा है.

इन सौदों की कोई स्वतंत्र जाँच आज तक नहीं हुई है.

जब मंदिर के अपने लोग ही आरोप लगाएँ, तो “राजनीतिक साजिश” का तर्क कहाँ जाता है?

विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक कहकर नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. और किया भी जाता है. लेकिन इस मामले में आवाज़ें वहाँ से भी उठ रही हैं जहाँ से सत्तारूढ़ दल के लिए जवाब देना और भी कठिन है.

महंत कमल नयन दास ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के उत्तराधिकारी हैं. यानी मंदिर के सबसे भीतरी वृत्त से. उन्होंने निष्पक्ष जाँच की माँग करते हुए बिना किसी का नाम लिए कहा: “कुछ लोग, जो पहले केवल रिक्शा या साइकिल से चलने की हैसियत रखते थे, आज उनके पास बड़ी कारें और बड़े मकान हैं.” यह बयान किसी राजनेता का नहीं. उस मंदिर के एक धर्माधिकारी का है जिसे BJP अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है.

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हिंदू परंपरा के सर्वोच्च धार्मिक नेताओं में से एक हैं. उन्होंने कहा, “भूमिपूजन के समय से यहाँ निरंतर अनियमितताएँ देखी जा रही हैं।”

यह सच है कि शंकराचार्य की राजनीतिक निष्ठा भारतीय जनता पार्टी की ओर नहीं रही है और राम मंदिर के उद्घाटन के समय से ही वे सरकार के कई निर्णयों की खुलकर आलोचना करते रहे हैं. लेकिन केवल इसी आधार पर उनके बयान को दलगत पूर्वाग्रह का परिणाम मान लेना उचित नहीं होगा. हिंदू धर्म में “शंकराचार्य” का पद सबसे महत्वपूर्ण और सम्मानित धार्मिक पदों में से एक माना जाता है, इसलिए उनकी बात को आसानी से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

विशेष रूप से तब, जब राम मंदिर आंदोलन और उससे जुड़े कानूनी संघर्ष के दौरान उन्होंने अपनी भूमिका निभाई है तथा इस विषय पर लगातार सार्वजनिक रूप से अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं. हालांकि, राम मंदिर के उद्घाटन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर उनके कई मत ट्रस्ट और सरकार से भिन्न रहे हैं, जिसके कारण उनके और मंदिर प्रबंधन के बीच वैचारिक मतभेद भी सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं.

BJP और RSS के अपने लोग. अयोध्या के BJP नेता डॉ. रजनीश सिंह ने PM मोदी को पत्र लिखकर CBI या ED जाँच का अनुरोध किया. उन्होंने The Wire को बताया: “शुरुआत में मुझे आरोपों पर संदेह था, लेकिन महंत कमल नयन दास के सार्वजनिक बयान के बाद मेरा संदेह पक्का हो गया. ट्रस्ट की चुप्पी ही यह संदेह पैदा कर रही है कि कोई न कोई गड़बड़ी ज़रूर हुई है.” 1982 से RSS से जुड़े अधिवक्ता मुरलीधर सिंह ने CAG ऑडिट की माँग की.

और अब ताज़ा खबर यह है कि RSS ने भी स्वयं इस पूरे मामले के घटनाक्रम पर एक रिपोर्ट माँगी है. यह PMO के बाद RSS का हस्तक्षेप है. और यह इस बात का प्रमाण है कि संघ परिवार के भीतर भी यह मामला दबाया नहीं जा सका.

जब आरोप लगाने वाले अपने घर के हों, जब धार्मिक नेतृत्व सवाल उठाए, जब पार्टी और संघ के भीतर से जाँच की गुहार लगे. तब “यह सब राजनीतिक है” कहना न केवल अपर्याप्त है, बल्कि यह स्वयं संदेह को और गहरा करता है.

सरकार का जवाब क्या है. और वह जवाब पर्याप्त क्यों नहीं है?

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इन तमाम आरोपों को खारिज करते हुए कहा: “कोई भी अखिलेश यादव के ट्वीट को गंभीरता से नहीं लेता.” यह BJP का आधिकारिक बचाव है. और यह बचाव बताता है कि सरकार के पास तथ्यात्मक जवाब नहीं है, केवल व्यक्ति पर हमला है.

पीयूष गोयल ने अखिलेश यादव की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाया. लेकिन महंत कमल नयन दास की विश्वसनीयता पर क्या कहेंगे? शंकराचार्य की विश्वसनीयता पर क्या कहेंगे? अपने ही BJP नेता डॉ. रजनीश सिंह की विश्वसनीयता पर क्या कहेंगे? RSS की रिपोर्ट माँग पर क्या कहेंगे? इन सवालों का जवाब गोयल के बयान में नहीं है.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने ट्रस्ट से विस्तृत रिपोर्ट माँगी है. मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा का अचानक अयोध्या दौरा हुआ. ये कदम इस बात के संकेत हैं कि सरकार इस विवाद की गंभीरता को समझती है. लेकिन प्रश्न यह है. क्या यह “भीतरी समीक्षा” सार्वजनिक होगी? क्योंकि यदि PMO की रिपोर्ट केवल भीतरी फाइलों में दफन हो जाए, तो यह जवाबदेही नहीं. संकट प्रबंधन होगा.

ट्रस्ट की एकमात्र सार्वजनिक प्रतिक्रिया वह वीडियो बयान है जिसमें चंपत राय ने कहा: “अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय सामने नहीं आया.” यह जवाब उस व्यक्ति के सवालों का उत्तर नहीं है जो खुद ट्रस्ट में अकाउंट्स हेड रहा हो. यह शंकराचार्य का जवाब नहीं, जो दशकों से हिंदू धर्म की नैतिक आवाज़ रहे हैं. और यह उन BJP-RSS कार्यकर्ताओं का जवाब नहीं जिन्होंने खुद PM को पत्र लिखा.

सबसे असुविधाजनक सवाल, निष्पक्ष जाँच होगी कैसे, जब जाँच की हर संस्था पर ही सवाल हो?

यहाँ इस पूरे प्रकरण की सबसे गहरी त्रासदी है.

CBI से जाँच की बात होती है. वही CBI जिसे सुप्रीम कोर्ट ने “पिंजरे का तोता” कहा था और जिसका उपयोग हमेशा और खास कर वर्तमान सरकार में केवल विपक्षी नेताओं और असहमत आवाज़ों के विरुद्ध हुआ है. ED से बात होती है. वही ED जिसके मामलों का बड़ा हिस्सा सिर्फ राजनीतिक विरोधियों पर केंद्रित रहा है. CAG की बात होती है. लेकिन उसकी रिपोर्टें सार्वजनिक विमर्श में वह स्थान नहीं पातीं जो उन्हें मिलना चाहिए.

यह किसी एक संस्था की कमज़ोरी नहीं है. पिछले एक दशक में चुनाव आयोग, न्यायपालिका, नियामक संस्थाएँ. लोकतंत्र के जो भी पहरेदार थे, उनकी स्वायत्तता पर लगातार और दस्तावेज़ीकृत रूप से दबाव पड़ा है. यह विपक्ष का आरोप नहीं. यह अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र सूचकांकों में, प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में और न्यायिक नियुक्तियों के पैटर्न में दर्ज है.

यही इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना है. जिन संस्थाओं के पास जाँच की शक्ति है, उनकी स्वतंत्रता पर ही प्रश्नचिह्न है. और जो सरकार जाँच करवा सकती है, वही इस ट्रस्ट की संरक्षक है. एक सुप्रीम कोर्ट-निगरानी में स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट ही एकमात्र ऐसा रास्ता बचता है जो किसी भी पक्ष को संतुष्ट कर सके. लेकिन क्या सरकार उस रास्ते पर चलने को तैयार है? यह सवाल अभी अनुत्तरित है. और यही अनुत्तरित रहना अपने आप में सबसे बड़ा जवाब देता है.


सबसे भारी सवाल वह है जो पूछा नहीं जा रहा

एक गरीब महिला ने अपनी चूड़ियाँ उतारकर दान दिया. एक मज़दूर ने अपनी एक दिन की मज़दूरी भेंट की. एक बुज़ुर्ग किसान ने खेत से बचाए सौ रुपये भगवान के चरणों में रखे. इन लोगों की आस्था के बदले उन्हें क्या मिला? यह देश जानना चाहता है.

यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या भ्रष्टाचार हुआ. वह जाँच का काम है. जो पूछा जाना चाहिए, और जो अब तक नहीं पूछा गया, वह यह है कि जब ट्रस्ट के अपने अधिकारी सवाल उठाएँ, जब शंकराचार्य बोलें, जब BJP-RSS के लोग PM को पत्र लिखें, जब RSS खुद रिपोर्ट माँगे, जब SBI स्वयं असामान्यताएँ देखे. तब भी एक पारदर्शी और स्वतंत्र जाँच क्यों नहीं होती?

जब सरकार जाँच की अनुमति नहीं देती, तो वह निर्दोषिता साबित नहीं करती. वह केवल यह संदेश देती है कि उत्तर उसके हित में नहीं हैं.

राम की प्राण-प्रतिष्ठा एक ऐतिहासिक क्षण था. लेकिन यदि उसी राम के मंदिर की दान-व्यवस्था पर इतने गंभीर और बहुस्तरीय सवाल उठें और जाँच न हो. तो इतिहास यह भी दर्ज करेगा कि आस्था को राजनीति की ढाल के पीछे छिपाया गया.

और वह ढाल जितनी देर तक टिकेगी. सवाल उतने ही बड़े होते जाएँगे.

Disclaimer: Portions of this content were enhanced with the assistance of AI Tools.