ये मंत्री की नहीं बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की सोती हुई तस्वीर है

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देश में केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा अगर किसी सरकारी विभाग की सबसे अधिक अनदेखी की जाती है तो वो है स्वास्थ्य और शिक्षा. ये दोनों हीं विभागें आम लोगों से सबसे अधिक क़रीब है और सबसे अधिक जुड़ा हुआ है. ये बात अलग है की देश के किसी भी कोने में इस मुद्दे पर चुनाव नहीं होता है और ना हीं देश की जनता कभी इन मुद्दों पर बात करती है. देश की जनता स्वास्थ्य और शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनने का प्रयास भी नहीं करती है. हर चुनाव के पहले आम लोगों को ख़ास कर आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के लोगों को जात पात धर्म और गाय बकरी जैसे मुद्दे दे दिए जाते हैं और सब उसी में उलज के रह जाते हैं.

देश की आम जनता और ख़ास कर ग़रीबों को जानबूझकर एक सोची समझी साज़िश के तरह काल्पनिक और बेतुकी बातों को मुद्दा बना के परोसा जाता है ताकि लोग वास्तविक मुद्दों की परवाह किए बिना वोट देते रहे कभी इस पार्टी तो कभी उस पार्टी को. लोग अपनी वास्तविक समस्या भूल कर उन्ही मुद्दों में फँस के रह जाते हैं, ना कोई अपनी समस्या को उठा पता है ना कोई किसी प्रकार का विरोध कर पता है. हर पाँच साल बाद जब चुनाव होता है लोग खुदसे जुड़े मुद्दे को भूल कर नेताओं की बातों में आकर मतदान करते हैं, उसके बाद पाँच साल तक नेता तो ग़ायब हो जाते हैं और लोगों का सामना उसी असली समस्या से होता है.

पिछले कई सालों से बिहार में कुछ ऐसा हीं हो रहा है, एक तरफ़ देश विश्व गुरु और विकसित देश बनने की बात कर रहा वहीं देश के कई राज्यों में आज भी कुपोषण से निजात नहीं पाया जा सका है. पिछले साल के एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 47.3 फीसद बच्चे कुपोषित हैं जिसमें 21.7 प्रतिशत अतिकुपोषित हैं. इन आंकरों को आप ऐसे समझ सकते हैं की प्रत्येक 100 में से लगभग 21 बच्चे अतिकुपोषित हैं और लगभग 47 कुपोषित, इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को आवश्यक सन्तुलित आहार नहीं मिल पा रहा है. लेकिन इन डरावनी आंकरों से किसी राजनीतिक पार्टी को कोई मतलब नहीं है, नेताओं को बस वोट से मतलब है. कुपोषण के शिकार बच्चे ग़रीब और निचले तबके के होते हैं, जो सरकारी मशीन में सबसे अधिक पिसते हैं, पूरा राजनीतिक तमाशा इन्हीं तबक़ों के नाम पर होता है लेकिन इन्हें ना तो अछी शिक्षा मिलती है और ना हीं स्वास्थ्य सुविधाएँ क्योंकि सरकारी विद्यालय और अस्पताल में ज़रूरी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं है अच्छी सुविधाएँ तो लोगों के कल्पना से भी बाहर है.

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जिन परिवारों के बच्चे कुपोषण के शिकार हैं या जिन परिवारों के बच्चे हर साल बिहार में चमकी बुखार से मरते हैं उन परिवारों और उनके जैसे अन्य परिवारों की पहुँच प्राइवेट अस्पताल और शिक्षा से बहुत दूर है. ऐसे हालात में भी सरकारें आराम से चल रही, एक तरफ बच्चे मर रहे दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्री का ध्यान सुस्ताने में, क्रिकेट स्कोर में है. बिहार की राजधानी पटना से सिर्फ़ 70 KM दूर हर साल एक निस्चित समय अंतराल में चमकी/दिमाग़ी बुखार मौत का तांडव कर रहा और सरकार बस गिनती मृत बच्चों की गिनती कर रही, ना सरकार ना वेवस्था, कोई कुछ नहीं कर पा रहा. चमकी बुखार सिर्फ़ वहाँ के बच्चों को हीं नहीं बल्कि राज्य और देश की सरकारी व्यवस्था को है वरना पाँच साल में 800-900 से अधिक बच्चों की जानें नहीं जाती.

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Photo Credit: ZeeNews

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री पाँच साल पहले 2014 में बिहार के उसी इलाक़े का दौरा कर चुके हैं, 2014 में बिहार में इस बीमारी से 355 बच्चों की मौत हुई थी लेकिन आज पाँच साल बाद भी क्यों वहाँ वही हालात है? क्यों ऐसे हालात में भी डॉक्टर और दबाएँ उपलब्ध नहीं है? अब मंत्री जी को फिर से एक साल का समय चाहिए, पाँच साल पहले जो बात बोलके मंत्री जी गाए थे आज पाँच साल बाद वही बात कर रहे हैं तो कैसे यक़ीन करें की अगले साल फिर वही बात नहीं दोहराएँगे. शायद वादों को दोहराने का ये सिलसिला ऐसे हीं चलता रहेगा जब तक जिन परिवारों के बच्चों की मौत हो रही वो सरकार और सरकार के प्रतिनिधियों से सवाल नहीं करेंगे.

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वैसे इस बीमारी का कोई ठोस इलाज नहीं है लेकिन इसे ला इलाज कहना भी जायज़ नहीं होगा, क्योंकि मेडिकल रीसर्च के बाद इसके रोक-थाम के कई उपाय पहले हीं जड़ी किए जा चुके हैं परंतु चमकी बुखार से पीड़ित राज्य की स्वास्थ्य वेवस्था और बहानेबाज सरकार को कौन बताए की रोक-थाम भी एक इलाज के तरह होता है; WHO भी मानता है की प्रिवेन्शन इज बेटर देन क्योर (Prevention is better than cure). सरकार अगर सही समय पर रोक-थाम के बताए उपायों का पालन और जरुरी स्वास्थ्य सुविधाएँ का इंतज़ाम करती तो शायद इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत नहीं होती.

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अगर सरकार सजग होती तो इन बच्चों को बड़ी आसानी से बचाया जा सकता था. सरकार की सतर्कता और जनता के प्रति जवाबदेही का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की, जब अस्पताल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री इस बीमारी पर बात कर रहे थे तभी मीडिया के सामने उनके सहयोगी केंद्रीय राज्य मंत्री चैन की नींद ले रहे थे और वहीं बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे क्रिकेट स्कोर जानने के लिए उतावाले थे. इतना ही नहीं पांडे जी को तो ऐसा लगता है ये मरने वालों की संख्या ज़्यादा नहीं, ये बात मंत्री जी मीडिया से बातचीत के दौरान बोला.

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मुज़फ़्फ़रपुर में अपने सामने बच्चों को मरते देखने के बाद भी देश के स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे सुकून की नींद ले रहे थे उसे देख तो ऐसा लगा की पूरी स्वास्थ्य वेवस्था और स्वास्थ्य विभाग इंसान का रूप धारण कर मज़े में सो रहा है. अगर हमारे देश की स्वास्थ्य वेवस्था और स्वास्थ्य विभाग की एक तश्वीर बनायी जाए या स्वास्थ्य वेवस्था और स्वास्थ्य विभाग को अगर इंसान के रूप में कल्पना किया जाए, चित्रित किया जाए तो वो डिट्टो वैसा दिखेगा जैसे अश्विनी कुमार चौबे मीडिया के सामने सोते दिख रहे थे, थका हुआ और लोगों की समस्या से बेपरवाह. किस हालात में, कहाँ और किन लोगों के बीच बैठे हैं, बच्चों और ग़रीब परिवारों पर क्या बीत रही रही इन सभी बातों से बेपरवाह नींद के आगोस में अपनी थकान मिटा रहा देश की स्वास्थ्य वेवस्था और स्वास्थ्य विभाग.

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