चुनावी तमाशा – भारतीय चुनाव का राष्ट्रीय पर्व से तमाशा बनने का सफर !

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Photo Credit: News18

वैसे तो भारत में होने वाले चुनावों में कम तमाशे नहीं होते मगर चुनावों का तमाशा बना दिया जाए ये भी कम नहीं होता।

चुनावों का मतलब होता है जनता अपने प्रतिनिधि भेजती है जो उनकी बातों को और उनकी समस्याओं को लोकसभा और विधानसभा के पटल पर रखे। जनता के प्रतिनिधि जनता के बीच से हों ऐसी परिपाटी है और एक सफल परिपाटी है। आप जब किसी में अपना भरोसा जताते हैं तो इसमें ये एक महत्वपूर्ण घटक होता है कि वह आदमी आपके बीच से है और आपने उसे आपके समस्याओं के लिए संघर्ष करते देखा है। भारत के आजादी के शुरुआत के वर्षों में जनता उन्हीं लोगों को चुनती थी जो देश के स्वतंत्रता संग्राम में भागीदार थे। समय के साथ ये बदलता गया और जनता ने इमरजेंसी के नायकों को चुनना शुरू किया जो फिर यह दिखाता था कि जनता ऐसे लोगों में विश्वास जता रही है जो उनके मुद्दों के लिए लड़ रहे हैं।

इसके बाद शुरू हुआ चुनावों का मज़ाक बना देने का एक तमाशा। अस्सी के दशक में राजनीतिक पार्टियों ने फिल्मस्टार और क्रिकेटरों को टिकट देना शुरू किया। ये लोग जनता के बीच बेहद लोकप्रिय होते थे और जनता आव देखती न ताव और इन्हें जिताती तो जिताती, इनके विरुद्ध खड़े एक जुझारू और जमीन से जुड़े नेता को हरवा देती। हारा हुआ नेता जनता के बीच का होता, स्थानीय होता और सालों जनता के मुद्दे को लेकर संघर्षरत रहता था पर ग्लैमर का एक तड़का और चुनाव का तमाशा बन जाता। एक ऐसा इंसान जिसे उस क्षेत्र की चौहद्दी तक न मालूम रहती, उस शहर के गलियों और मुहल्लों के नाम तक न पता रहते, उस जिले के लोगों की मुश्किलें न मालूम रहतीं वो अपने लोकप्रियता के बल पर संसद पहुँच जाता। ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे- ऐसे नेता जिन्हें अपने क्षेत्र और लोगों के बारे में जानकारी न हो क्या अपने क्षेत्र से न्याय कर पाएगा, ये आप सोचिये।

चुनाव क्या मज़ाक हैं? जो किसी को भी चुनकर भेज दिया। रात में किसी ने भावुक कर दिया और अगले दिन सुबह उठे और किसी के भी नाम पर ठप्पा लगा दिया। फिर 5 साल रोते रहे कि नेता ने कोई काम नहीं किया, नाकारा और नालायक है। चुनावों का इस तरह तमाशा बनाने में राजनीतिक पार्टियाँ एक कदम आगे हैं। उनके पार्टी से जुड़ा कार्यकर्ता पार्टी को 5 साल, 10 साल, 15 साल समर्पण कर देता है मगर उसे बदले में मिलता क्या है- किसी फिल्म स्टार या क्रिकेटर का चुनाव प्रचार। उसे मालूम होता है कि वह लोगों की सेवा बेहतर कर सकेगा पर उसकी पार्टी को उसमें भरोसा नहीं रहता। पिछले कुछ समय में धड़ल्ले से ऐसे लोगों को टिकट बांटे गए हैं और ऐसा सभी पार्टियों ने किया है। ये जनता के साथ बहुत ही गन्दा मज़ाक है। इसलिए मैंने इस चुनावों का तमाशा बना देना कहा है।

जनता ने कई ऐसे सिलेब्रिटी को चुनकर भेजा पर थोड़े दिनों में ही जनता को सच्चाई से सामना हो गया। इसके बावजूद ये सिलसिला बदस्तूर आजतक जारी है। आज भी पार्टियाँ कई जगहों से ऐसे उम्मीदवार खड़े करती हैं जिनका उस क्षेत्र से दूर-दूर का वास्ता नहीं होता है। सबकुछ जानने का दम्भ भरने वाली जनता आज भी फंसती है। कहीं-कहीं तो जनता के सामने दूसरा विकल्प भी नहीं बचता क्योंकि दोनों बाहर से आए सिलेब्रिटी होते हैं। मुम्बई में कई बार ऐसा हुआ है कि एक एक्टर के सामने दूसरा और जनता के पास इतनी बुद्धि भी नहीं कि तीसरे-चौथे के बारे में सोच भी ले।

चंडीगढ़ में भी 2014 में ऐसा ही हुआ था जब दो-दो सिलेब्रिटी भिड़ गए थे और जनता ने एक से खुश होकर उसे चुना था पर अब चंडीगढ़ की जनता ही बताएगी कि उनका निर्णय कैसा था। एक क्रिकेटर ने तो हद ही कर दी, कभी इस पार्टी में तो कभी उस पार्टी में। जनता के सामने ये सब होता रहा और जनता देख कर भी उसे चुनती रही। ये तमाशा नहीं तो और क्या है? ये सब अभी लिखने का आशय है कि आज भी पार्टियाँ धड़ल्ले से सिलेब्रिटीज को टिकट बाँट रही हैं. सिलेब्रिटीज खुशी खुशी इस तमाशे का हिस्सा बनने को तैयार हैं। मैं समझ सकता हूँ कि उन्हें भी लोगों की सेवा का मौका मिलना चाहिए पर जहाँ पर आपसे ज़्यादा अनुभवी लोग मौजूद हैं वहाँ आपका नम्बर तो बाद में आना चाहिए न।

ऐसा भी नहीं है कि सारे सिलेब्रिटीज नेता बनकर निराश ही करते हैं। मुम्बई की एक सीट से एक एक्टर इतना बेहतरीन नेता हुआ कि उसके नाम पर उसकी बेटी को दो-दो बार चुन लिया गया। साउथ में तो खैर इतिहास ही रहा है एक्टरों को नेतागिरी करने का। आंध्रप्रदेश के सबसे बड़े नेता जिन्होंने इतना विकास किया कि उनके नामपर आजतक वोट मांगा जाता है वे एक बड़े फ़िल्म एक्टर थे। लेकिन ऐसे इक्का-दुक्का ही हुए हैं जिन्होंने एक्टिंग से रिटायरमेंट लेकर लोगों की बहुत सेवा की। मगर इन सभी नेताओं ने जमीन पर बहुत संघर्ष किया। ये पैराशूट से लैंड हुए लोग नहीं थे। थे भी तो इन्होंने चुने जाने से पहले जनता के बीच जाकर उनका विश्वास हासिल किया था। साउथ में तो यात्रा का बड़ा महत्व रहा है। यहाँ नेता हज़ारों किमी यात्रा करके सत्ता में आते हैं। आज के समय में कौन सा सिलेब्रिटी अपने क्षेत्र का दौरा कर पाता है? सैकड़ों-हज़ारों किमी यात्रा की बात तो रहने दीजिए।

जॉर्ज ऑरवेल ने कहा है कि जो जनता चोरों, भ्रष्टों और क्रिमिनलों को चुनती है वह जनता पीड़ित नहीं होती बल्कि उसके साथ हो रहे अन्याय की भागीदार होती है। इनमें अगर किसी सिलेब्रिटी को भी जोड़ लें तो गलत नहीं होगा। जनता के सामने विकल्प क्या हैं? आप अमुक पार्टी को पसन्द करते हैं पर आपकी पसंदीदा पार्टी आपके पहचान के स्थानीय नेता की जगह बॉलीवुड या ईडन गार्डन्स से पैराशूट से लैंड हुए किसी सेलिब्रिटी को टिकट दे देती है। फिर आप आँख मूंद कर पार्टी में भरोसा जताते हुए उसको चुन लेते हैं मगर 5 साल बाद पता चलता है कि गलती हो गई थी। वो 5 साल केवल आपके बर्बाद नहीं होते। आपके शहर, आपके ज़िले और आपके राज्य के बर्बाद होते हैं। आपकी पार्टी की बेवकूफी में आपने उसका साथ दिया होता है।

चुनावों का तमाशा बनाया तो जा रहा है लेकिन ये तमाशा बिना जनता के सहयोग के हिट नहीं होता। जनता हम और आप ही हैं। हम और आपके हाथों में ये शक्ति है कि सोचे समझें और फिर निर्णय करें। हाँ, अगर आपके सोचने-समझने की शक्ति थोड़ी कमज़ोर है और आपको अपने उम्मीदवार से कोई लेना-देना नहीं है तो फिर आगे के 5-10-15 सालों तक शिकायत करने को तैयार रहिये। ऐसी जनता रहे तो इस देश का भगवान ही मालिक है जैसा कि अबतक रहा है।

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