भारत के प्रथम आजाद सरकार के 75वी वर्षगांठ पर मोदी का लाल किले से सम्मान

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अभी हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज़ाद हिंद फ़ौज (आई एन ए) की 75 वी वर्षगांठ को संबोधित किया, जो कि वास्तव में नेताजी सुभाष चंद्र द्वारा संगठित एवं संचालित भारत की आजाद सेना थी. इस कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानी, केंद्रीय मंत्री और अवकाश प्राप्त तीनों सेनाओं के पूर्व सैनिकों ने भाग लिया. इसके अलावा इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुभाष चंद्र बोस के पोते के. सी. बोस भी सम्मिलित हुए.

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प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा किए गए कार्यों का इस कार्यक्रम में उल्लेख किया उनकी दूरदर्शिता के महत्व को समझाते हुए तत्कालीन विपक्ष पर करारा निशाना भी साधा. उन्होंने कहा एक परिवार को बढ़ावा देने के लिए भारत के न जाने कितने महापुरुषों के बलिदान को दरकिनार कर दिया गया, जिनमें कि उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और नेता जी का नाम लिया. नेताजी के पूर्वोत्तर भारत को साथ लेकर चलने की रणनीति और उससे लगे हुए देशों के साथ मित्रता इन दोनों मुख्य पहलुओं का भी जिक्र किया.

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आजाद हिंद फौज की बात करें तो उसकी स्थापना 1942 में जनरल मोहन सिंह ने सर्वप्रथम की थी, जिसे लोग प्रथम आजाद हिंद फौज (फर्स्ट आई एन ए) के नाम से भी जानते हैं. हालांकि पहले से ही नेता जी के नाम का जिक्र नेतृत्व के लिए आगे आने लगा था और अंततः नेताजी ने द्वितीय आजाद हिंद फौज का निर्माण किया. नेताजी तब के कांग्रेस में कार्यरत होने के बावजूद कांग्रेस और गांधीजी के विपरीत विचारधारा वाले व्यक्ति थे.

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ब्रिटिश सरकार की पाबंदियों और नजर बंद करने के कूटनीति को मात देते हुए, नेताजी ने विदेशी ताक़तों से हाथ मिला कर तब की रॉयल इंडियन आर्मी के सैनिकों और जेल में विश्व के अलग-अलग देशों में बंद हुए भारतीय सैनिकों को मिला कर आजाद हिंद सेना का निर्माण किया| इतिहासकारों की माने तो ब्रिटिश हुकूमत के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं था.

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नेताजी के इस कार्य में जर्मनी, जापान और दक्षिण एशिया के कई देशों ने सहयोग दिया. नेताजी ने कई सामान्य नागरिकों को भी अपनी सेना में सशक्त प्रशिक्षण देकर शामिल किया और उस सेना के कई अंग बनाए, जिनमें “टोक्यो बॉयज” सबसे प्रसिद्ध अंग था. उनकी सेना के दो प्रमुख अंग “यू-गो” एवं “हा-गो” बहुत ही महत्वपूर्ण थे, और द्वितीय विश्व-युद्ध में इन्होंने बर्मा की लड़ाई में भाग भी लिया. नेताजी के पास युद्ध कौशल,भौगोलिक ज्ञान और राजनीति की बहुत महनीय समझ थी. इसी परिपेक्ष में नेता जी द्वारा दिया हुआ उद्घोष वाक्य “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” हमारी जहन मैं आज भी गूंजता है. नेताजी की मौत रहस्य थी, न जाने वह विश्व में कहां और किस कोने में खो गए लेकिन हम सब भारतीयों के हृदय में वह आज भी जिंदा है.