ऑपरेशन कहुता- जब भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के परमाणु सयंत्र को ध्वस्त होने से बचाया

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ऑपरेशन कहुता को भारत के इंटेलिजेंस एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग(RAW) ने सन 1971-72 में लॉन्च किया. इस ऑपरेशन का मकसद पाकिस्तान के सीक्रेट विपन प्रोग्राम का पता लगाना और उसके एग्जैक्ट लोकेशन को डिटेक्ट करना था.  कहा यह जाता है कि इस मकसद में इजराइल की इंटेलिजेंस एजेंसी मोसाद ने भी भारत की मदद की थी.

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Image Source: IndiaTimes

1977 वह समय था जब भारत परमाणु परीक्षण कर चुका था और पाकिस्तान परमाणु क्षमता को हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था. इसी कड़ी में पाकिस्तान में वहां के परमाणु कार्यक्रम के जनक कहे जाने वाले ऐम एक्यू खान को एक गुप्त मिशन पर आयरलैंड के न्यूक्लियर पावर प्लांट में नौकरी करने के लिए भेजा, परंतु एक्यू खान का मुख्य मकसद परमाणु ऊर्जा संवर्धन से जुड़ी जानकारियाँ चुराना था. जिससे कि वो वापस पाकिस्तान आकर बम बनाने की प्रक्रिया में उस जानकारी को इस्तेमाल कर सकें. और हुआ भी यही, एक दिन अचानक से एक्यू खान अपनी पूरी फैमिली के साथ वहां से भाग निकले और पाकिस्तान में आकर गुपचुप तरीके से परमाणु कार्यक्रम को विकसित करने में लग गए.

पाकिस्तान में बहुत सारे स्थान थे, जहाँ पर कई सेक्रेट विपन डेवलपमेंट प्रोग्राम चल रहा था जिस कारन से यह पता कर पाना आसान नहीं था की वह कौन सा स्थान है, जहां पर पाकिस्तान परमाणु बम बनाने की तैयारी कर रहा है. इसको पता करने के लिए रॉ(RAW) ने अपने कुछ विश्वस्त गुप्तचरों को इस मिशन पर लगाया. जिनका काम था, पाकिस्तान में एक नेटवर्क तैयार करना जिसकी मदद से वहां के सभी संभावित स्थानों पर नजर रखी जा सके और पता लगाया जा सके की परमाणु ऊर्जा संवर्धन का काम कहां पर चल रहा है. लगभग 7 से 8 वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद RAW के एजेंटों ने वहां पर अपना एक जाल बिछा दिया और जितने भी महत्वपूर्ण सैन्य उपकरण बनाने वाली संस्थान थी उनके प्रमुख व्यक्तियों के मूवमेंट को ट्रैक करना शुरू किया.

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फिर भी अभी तक यह पता कर पाना मुश्किल लग रहा था की परमाणु ऊर्जा पर कहाँ पर काम किया जा रहा है. विभिन्न प्रकार के गतिविधियों पर ध्यान रखते हुए RAW के एजेंटों ने एक बात पर गौर किया कि पाकिस्तान के एक छोटे से शहर एक छोटे से क्षेत्र में शायद ऐसी कोई गतिविधि चल रही है और साथ ही उन्होंने यह भी गौर किया कि वहां कार्यरत सभी साइंटिस्ट एक खास सलून में बाल कटाने जाते हैं. वहां से इकट्ठा किए गए बालों के सैंपल को भारत जांच के लिए भेजा गया. उन बालों में यूरेनियम के उपस्थिति पाई गई जिससे यह साफ हो गया कि पाकिस्तान परमाणु बम बनाने का काम खान रिसर्च लैबोरेट्री में ही कर रहा था जो कि रावलपिंडी के पास एक छोटे से शहर “कहुता मे था.

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परमाणु कार्यक्रम की पुष्टी होने के बाद अगला लक्ष्य था पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना. इसके तहत एजेंटो ने अपनी पहुंच उसी प्लांट में काम कर रहे एक साइंटिस्ट तक बनाई और कुछ पैसे के बदले में वह प्लांट की पूरी जानकारी देने को तैयार हो गया. उसने बहुत सी जानकारी सांझा भी कर दिया था. उस समय RAW को पेमेंट करने के लिए प्रधानमंत्री के आदेश की आवश्यकता होती थी.

तात्कालिक रॉ चीफ उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास पहुंचे और पूरी बात उनको बताएं साथ ही यह भी कहा कि उनके पास एक पूरा प्लान है जिसके तहत पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाएगा, साथ ही उन्होंने पैसे देने की भी मांग की जो  जानकारी देने वाले शख्स को दिया जाना था. पूरी बात सुनने के बाद मोरारजी देसाई ने RAW चीफ को खरी-खरी सुना दी और पैसे देने से मना कर दिया और यह हिदायत भी दे दी की इस प्रोजेक्ट पर काम तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए. वह यहीं नहीं रुके उन्होंने बातों-बातों में पाकिस्तान के जनरल जिया उल हक को सारी बातें बता दी.

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Image Source: quora.com

इस बात का पता चलते ही पाकिस्तान ने आई एस आई (ISI) को यह काम दिया कि वह पता लगाए कौन से लोग हैं जो RAW के लिए काम कर रहे हैं. आईएसआई ने इस काम को बखूबी निभाया और इस मिशन पर कम कर रहे RAW के सरे एजेंट्स मार दिए गये या उनको भागना पड़ा.

इस तरह से आधुनिक इतिहास के एक सबसे बड़े और सफल खुफिया मिशन को उसी देश के मुखिया ने बर्बाद कर दिया. इस पूरे प्रकरण का सबसे ज्यादा नुकसान भारत के बाहरी मामलों के इंटेलिजेंस एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग(RAW) को चुकानी पड़ी,  क्योंकि उनके बहुत सारे प्रतिभावान एजेंटों को अपनी जान गवानी पड़ी साथ ही भारत देश को भी बहुत नुकसान हुआ. आज के परिप्रेक्ष्य में यदि सोच कर देखें की पाकिस्तान के पास परमाणु बम नहीं होता तो क्या होता है . शायद भारत सामरिक दृष्टिकोण से बहुत ही अच्छे स्थिति में होता और उन्हें इतने सारे पैसे डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने में ना लगाना परता.